
“मराठी नहीं बोलूंगा? ऐसा नहीं चलेगा!” — क्या भाषा अब राजनीतिक चेतावनी बन चुकी है?
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का यह बयान —”मैं मराठी नहीं बोलूंगा? ऐसा नहीं चलेगा”—महज़ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी की तरह गूंजा।
ऐसे दौर में जब राज्यपाल से लेकर मनसे तक हर कोई भाषा पर अपना झंडा गाड़ने में जुटा है, यह सवाल ज़रूरी हो गया है कि क्या मराठी अब अस्मिता का नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन का औजार बन चुकी है?
मराठी: सम्मान की मांग या दबाव की ज़मीन?
अजित पवार का यह कहना कि “मराठी का अपमान बर्दाश्त नहीं होगा”—तात्कालिक रूप से भले सही लगे, लेकिन इसकी समय-सीमा और राजनीतिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। क्या यह बयान अचानक आया? बिल्कुल नहीं।
जब राज्यपाल ने कुछ दिन पहले पूछा—”मराठी नहीं बोलूंगा तो क्या मारेंगे?”—तब से माहौल पहले ही गर्म था। अब उसी आंच को राजनीतिक तंदूर में सेंकने का खेल तेज हो गया है।
मनसे पहले से यही कहती रही है—”मराठी पहले, निवेश बाद में।” अब सत्ता पक्ष के प्रमुख नेता भी उसी लय में बोलने लगे हैं। यह अचानक नहीं हुआ।
गैर-मराठी नागरिकों को संदेश या साजिश?
यह सच है कि हर राज्य में स्थानीय भाषा का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सम्मान और डर—दो अलग ध्रुव हैं।
जब कोई नेता मंच से कहता है कि “मराठी नहीं बोलूंगा? ऐसा नहीं चलेगा”,तो वह अनजाने में उन ताकतों को खुली छूट देता है जो सड़क पर भाषा के नाम पर हिंसा को जायज़ ठहराते हैं।
क्या डिप्टी सीएम को यह नहीं मालूम कि हाल के दिनों में मनसे कार्यकर्ताओं पर हिंदी भाषी नागरिकों को पीटने के आरोप लगे हैं? क्या यह चेतावनी उन पर भी लागू होती है?
राजभवन बनाम मंत्रालय: मराठी अब राजनीतिक अखाड़ा
भाषा को लेकर राज्यपाल और महाराष्ट्र सरकार आमने-सामने हैं। एक ओर राज्यपाल तमिलनाडु से आकर महाराष्ट्र में मराठी सीखने की कोशिश में हैं, दूसरी ओर उन्हें “मराठी नहीं बोलने” के लिए घेरा जा रहा है।
सवाल उठता है: क्या यह वही महाराष्ट्र है जो विविधता का सम्मान करता आया है? क्या भाषा का इस्तेमाल अब विरोधी विचारों को दबाने के लिए हो रहा है?
निष्कर्ष:मराठी महाराष्ट्र की आत्मा है—इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन आत्मा को राजनीति का हथियार बनाना आत्मघाती है।
अगर “मराठी नहीं बोलूंगा? ऐसा नहीं चलेगा“ जैसे बयान चलन में आए, तो कल को कोई “हिंदी नहीं बोलूंगा”, “गुजराती नहीं बोलूंगा”, “तमिल नहीं बोलूंगा” कहेगा — और देश की एकता का स्वर बिखर जाएगा।
भाषा सम्मान की बात है, जबरन थोपी गई भावना नहीं।
सत्ताधारी दलों को यह तय करना होगा कि वे भाषा का नेतृत्व करना चाहते हैं या उसे भुनाना। वरना सड़कों पर भाषा नहीं, नागरिकों का भरोसा पिटता रहेगा।
विशेष रिपोर्ट संपादकीय टीम
