“जो मनसे का चल रहा है — एक सियासी व्यापार, मराठी भाषा का नहीं प्रेम“
मुंबई: विशेष संपादकीय
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का जो “मराठी प्रेम” का झूठा दिखावा चल रहा है, वह केवल एक सियासी ड्रामा बनकर रह गया है। हाल ही में एक हिंदी चैनल द्वारा किए गए सवालों ने मनसे के कार्यकर्ताओं की सच्चाई को बेनकाब कर दिया। सवाल मराठी भाषा और संस्कृति से जुड़े थे, जैसे “मराठी भाषा दिवस कब मनाया जाता है?” और “मराठी में स्वर और व्यंजन कितने हैं?” लेकिन मनसे के कार्यकर्ताओं को इसका कोई जवाब नहीं था। वे ना तो मराठी के बारे में जानने की इच्छाशक्ति रखते हैं और न ही उस भाषा से वास्तविक प्रेम दिखाते हैं।
सवालों का जवाब कुछ इस तरह आया, “हमें कुछ नहीं मालूम, जो नेता ने कहा वही किया!”
यह बयान साफ तौर पर यह बताता है कि मनसे कार्यकर्ताओं का मराठी से प्रेम सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य जनता को भ्रमित करना और एक वोट बैंक तैयार करना है।
मराठी प्रेम या राजनीति का खेल?
जब एक संगठन या पार्टी अपनी असली पहचान को सिर्फ अपनी भाषा या संस्कृति के नाम पर स्थापित करने की कोशिश करती है, तो सवाल उठता है — क्या यह वाकई में मराठी भाषा से प्रेम है या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक चाल है? अगर वाकई मराठी भाषा से प्रेम होता, तो कार्यकर्ता कम से कम मराठी के बुनियादी तथ्यों से तो परिचित होते।
यहां तक कि मराठी भाषा दिवस (27 फरवरी) और मराठी को राज्य में आधिकारिक मान्यता (1 मई 1960) की जानकारी भी मनसे कार्यकर्ताओं को नहीं है। क्या इस प्रकार का व्यवहार वाकई में मराठी भाषा के प्रति सम्मान को दर्शाता है?
भाषा के नाम पर राजनीति क्यों?
अफसोस की बात है कि अब मराठी भाषा का इस्तेमाल सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडे के तहत किया जा रहा है। जहां पर भाषा को वोट बैंक में बदल दिया गया है, वहीं इसकी असल पहचान और गरिमा को भुला दिया गया है। यह वही राजनीति है, जो समाज को बांटने के लिए भाषा को एक हथियार बनाती है।
जब हिंदी और मराठी भाषाओं में बुनियादी सवाल पूछे जाएं और कार्यकर्ता तिलमिला उठें, तो यह स्पष्ट होता है कि भाषा की रक्षा का यह दावा महज एक राजनीतिक व्यापार है।
समाज को समझने की जरूरत है
भाषा का असली प्रेम सिर्फ नारे लगाने से नहीं आता, बल्कि उसके प्रति गहरी समझ और सम्मान से आता है। हमें अब यह समझने की जरूरत है कि किसी भी भाषा का असली सम्मान उस भाषा के ज्ञान और उसकी सच्ची समझ में है, न कि धमकियां देने या किसी के साथ हिंसा करने में।
अगर मनसे कार्यकर्ता वाकई मराठी के प्रति प्रेम दिखाना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी भाषा की वास्तविक पहचान को जानने की आवश्यकता है।
आज, महाराष्ट्र के नागरिकों को यह समझने की जरूरत है कि कोई भी संगठन या पार्टी, जो भाषा और संस्कृति के नाम पर सिर्फ राजनीति करता है, उसे खुद पर और समाज पर संदेह करना चाहिए।

