इटावा

प्रशासनिक गरिमा बनाम मंचीय संतुलन: इटावा-औरैया एवं अन्य में मंचों की व्यवस्था पर उठते सवाल

प्रशासनिक गरिमा बनाम मंचीय संतुलन: इटावा-औरैया एवं में मंचों की व्यवस्था पर उठते सवाल

इटावा/औरैया/उत्तर प्रदेश 

प्रशासनिक गरिमा बनाम मंचीय संतुलन: इटावा-औरैया एवं में मंचों की व्यवस्था पर उठते सवाल

हाल के आयोजनों में इटावा व औरैया जनपदों में मंचीय व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के दौरान यह देखा गया है कि मंचों पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को केंद्र में स्थान दिया जा रहा है, जबकि जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को साइड की कुर्सियों पर बैठाया जा रहा है।

 

25 जून को कलेक्ट्रेट सभागार, इटावा में आयोजित “आपातकाल दिवस” के कार्यक्रम में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली, जिसमें मंच की केंद्रीय कुर्सी पर विधायक महोदय/महोदया को स्थान दिया गया, जबकि जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक किनारे पर बैठे दिखाई दिए।

 

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जनप्रतिनिधियों का सम्मान सर्वोपरि है, किंतु प्रशासनिक पदों की गरिमा और मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक मानी जाती है। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा समय-समय पर अधिकारियों की भूमिका, मंच व्यवस्था एवं कर्तव्यों के संचालन संबंधी स्पष्ट दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।

 

यदि ऐसी प्रवृत्तियाँ बार-बार दोहराई जाती रहीं तो इससे शासन और प्रशासन की संयुक्त छवि तथा प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रभाव पड़ सकता है। आवश्यकता है कि भविष्य के आयोजनों में कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट हो, और मंचीय व्यवस्था पूर्वनिर्धारित गरिमामय क्रम में सुनिश्चित की जाए, जिससे सभी पक्षों का सम्मान सुरक्षित रह सके।

 

यह विषय किसी टकराव का नहीं, बल्कि लोक प्रशासन और लोकतंत्र में संतुलन का है। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा यदि इस दिशा में समुचित संज्ञान लिया जाता है, तो इससे जिला स्तर पर प्रशासनिक मनोबल व कार्यसंस्कृति दोनों को बल मिलेगा।

 

देवेन्द्र सिंह तोमर

मुख्य संपादक, विशाल समाचार

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