संपादकीय

भारत की चुप्पी, ट्रंप की ट्वीट और एक निर्णायक संकेत

भारत की चुप्पी, ट्रंप की ट्वीट और एक निर्णायक संकेत

 

रिपोर्ट डीएस तोमर 

जब अमेरिका ने खुद को मध्यस्थ घोषित किया, भारत ने अपने धैर्य और दृढ़ता से दिखाया—यह नया भारत है, जो फैसला खुद करता है।

 

 

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान और भारत के बीच कथित युद्धविराम की तीन बार घोषणा ट्विटर पर करना कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं था। यह उस पुराने वैश्विक सोच का प्रतिबिंब है जिसमें कुछ शक्तियां आज भी खुद को हर द्विपक्षीय मसले में ‘ट्रबलशूटर’ मानती हैं। लेकिन यह 21वीं सदी का भारत है—नया भारत। यह भारत अब न तो किसी के दबाव में आता है और न ही अपने निर्णयों के लिए किसी की मुहर का इंतजार करता है।

 

यह स्वाभाविक सवाल उठता है—ट्रंप आखिर चाहते क्या हैं? क्या यह केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा है? या भारत-पाक रिश्तों में अमेरिका फिर से ‘थर्ड पार्टी’ बनकर अपना प्रभुत्व जताना चाहता है? ट्रंप की ट्वीट कूटनीति भारत की संप्रभुता को हल्के में आंकने की एक विफल कोशिश रही।

 

भारत सरकार ने चुप रहकर जवाब दिया है, लेकिन वह चुप्पी गर्व से भरी है। यह एक सधी हुई रणनीतिक चुप्पी है, जो बताती है कि भारत अब आत्मनिर्भर भी है और आत्मविश्वासी भी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है—एक शांत, संयमित, लेकिन स्पष्ट संदेश कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा स्वयं कर सकता है।

 

सिंधु जल समझौते को लेकर भी पुनर्विचार की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं। और यह स्वाभाविक है। जब पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता है, तो भारत को यह सोचने का पूरा अधिकार है कि क्या उसे अब भी उस समझौते को निभाना चाहिए जो सद्भाव और शांति के उद्देश्य से बना था?

 

इस समय सबसे ज़रूरी है—एकता। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस को चाहिए कि वे इस समय राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें। सरकार को घेरने की राजनीति की अपनी जगह है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को कमज़ोर दिखाने की कीमत देश को चुकानी पड़ती है।

 

भारत अब विश्वगुरु बनने की राह पर है। यह राह कठिन है, लेकिन ठोस है। ट्रंप हों या कोई और, भारत की दिशा अब भारत ही तय करेगा।

 

भारत की नीति साफ़ है—शांति की पहल ह मारी ओर से होती है, लेकिन जब बात सम्मान और सुरक्षा की हो, तो भारत पीछे नहीं हटता। ट्रंप की ट्वीट भारत की कूटनीति को न तो बदल सकती है, न ही भारत के आत्मबल को डिगा सकती है। यह समय है, जब देश को एक स्वर में कहना चाहिए—”भारत बोलेगा जब बोलेगा, कोई दूसरा नहीं।”

 

 

 

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