संपादकीय

कुपवाड़ा में समाजसेवक की घर में घुसकर हत्या से घाटी में फिर दहशत, आखिर कब थमेगा आतंक का सिलसिला?

कुपवाड़ा में समाजसेवक की घर में घुसकर हत्या से घाटी में फिर दहशत, आखिर कब थमेगा आतंक का सिलसिला?

पहलगाम हमले के बाद आम जनभावना यही है कि दहशतगर्दी को पोसने वाले पाकिस्तान के खिलाफ कोई निर्णायक कदम उठाया जाए। स्पष्ट है कि वहां की सेना आतंकवादियों को प्रशिक्षण और संरक्षण देती है।

यह गंभीर चिंता का विषय है कि कश्मीर घाटी में आतंकवादी गतिविधियों पर विराम नहीं लग पाया है। पिछले हफ्ते पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश है। दुनिया के बहुत सारे देशों ने इसकी निंदा की है। उस हमले में छब्बीस लोग मारे गए। इसकी प्रतिक्रिया में भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। कश्मीर घाटी में सुरक्षा व्यवस्था चौकस कर दी गई है। पूरे कश्मीर ने इस घटना के विरोध में बंद रखा और आतंकवाद के खिलाफ जगह-जगह जुलूस निकाले गए। इसके बावजूद घाटी में अगर आतंकवादियों के मंसूबे कमजोर नहीं पड़े हैं, तो स्वाभाविक ही सुरक्षा इंतजाम को लेकर फिर से सवाल सिर उठाने लगे हैं।

गौरतलब है कि कुपवाड़ा में संदिग्ध आतंकवादियों ने एक समाजसेवक के घर में घुस कर उसे गोली मार दी। छिपी बात नहीं है कि घाटी में आतंकवादी हमलों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। हालांकि वह बार-बार अपने को पाक-साफ साबित करने की कोशिश करता है, भारत के प्रति सहयोग का दिखावा भी करता है, पर दुनिया की नजरों से उसकी हकीकत छिपी नहीं है। पहलगाम के बाद कुपवाड़ा में इस तरह घर में घुस कर हमला करने के पीछे दहशतगर्दों की मंशा साफ है। वे संदेश देना चाहते हैं कि उनके मंसूबे कमजोर नहीं पड़े हैं।

मगर सवाल है कि वहां तैनात खुफिया एजंसियों और सुरक्षा बलों से क्यों और कैसे चूक हो रही है कि वे आतंकवादियों की साजिशों को समय रहते समझ नहीं पा रहे। पहलगाम हमले के पीछे बड़ा कारण सुरक्षा इंतजाम में घोर लापरवाही थी। इसके लिए सरकार ने सर्वदलीय बैठक में अफसोस भी जताया और इसे तुरंत दुरुस्त कर लेने का आश्वासन दिया। इस वक्त वहां राष्ट्रीय सुरक्षा एजंसी घटना की जांच में जुटी है। पूरी घाटी में सुरक्षाबलों की संख्या बढ़ा दी गई है। खुफिया एजंसियां चौकस हैं। इसके बावजूद अगर आतंकी किसी घर में घुस कर हमला करने में कामयाब हो जाते हैं, तो स्वाभाविक ही आतंकवाद से लड़ने संबंधी हमारी तैयारियों पर अंगुलियां उठेंगी। नौ वर्ष पहले नोटबंदी हुई, तो दावा किया गया था कि इससे आतंकियों की कमर टूट जाएगी।

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