जातीय ज्वाला में झुलसता उत्तर प्रदेश: क्या यह 2027 की साजिश की शुरुआत है?
विशाल समाचार मुख्य संवाददाता
इटावा के वकेवर गांव और प्रयागराज में बीते दिनों जो कुछ हुआ, वह एक गहरी साजिश की ओर इशारा करता है। कथावाचक पर हमला हुआ — पुलिस ने कार्रवाई की, चार आरोपियों को जेल भेजा। मामला शांत हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ।
इसके बजाय कथावाचक के पक्ष में खड़े लोगों ने प्रतिशोध में आरोपी पक्ष के गांव पर हमला कर दिया। वहाँ से हिंसा भड़की, जिसने कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं।
पुलिस ने मौके पर पहुँचकर हालात काबू में लेने की कोशिश की, लेकिन खुद पर पत्थरों की बौछार झेलनी पड़ी। कई पुलिसकर्मी घायल हुए और उनकी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया।
क्या यह वही प्रदेश है जहाँ पुलिस को ‘जन रक्षक’ कहा जाता है? क्या वर्दी में खड़े लोग अब किसी भीड़ के निशाने पर यूँ ही चुपचाप खड़े रहेंगे?
इसी तरह प्रयागराज में सांसद चंद्रशेखर आज़ाद को रोके जाने के बाद भीम आर्मी समर्थकों ने पुलिस से भिड़ंत की, सरकारी वाहनों को फूंका और सड़कों को रणभूमि में बदल दिया।
ये सिर्फ प्रदर्शन नहीं थे, यह खुला विद्रोह था — लोकतंत्र के खिलाफ, क़ानून के खिलाफ, और शांति के खिलाफ।
फिर भी विपक्ष के कुछ नेता, खासकर गगन यादव और अखिलेश यादव, इस पर न तो निंदा करते हैं, न ही हिंसा को रोकने की अपील करते हैं। उलटे, कुछ स्थानों पर तो उनके समर्थक मंच से कह रहे हैं कि “ब्राह्मणों को देश प्रदेश से बाहर कर देंगे।”
प्रयागराज चंद्रशेखर आजाद कार्यकर्ता पुलिस की गाड़ियां तोड़ते हुए
क्या यही है नया भारत का सपना?
क्या उत्तर प्रदेश किसी जाति विशेष की जागीर है?
सवाल यह भी है कि जब प्रशासन ने दोनों पक्षों पर एफआईआर दर्ज की है, गिरफ्तारी भी की है, तब भी कुछ समूह क्यों भड़काए जा रहे हैं?
आज योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव आमने-सामने हैं।
आज धीरेन्द्र शास्त्री और विपक्ष आमने-सामने हैं।
आज संविधान और जातिवादी राजनीति आमने-सामने हैं।
उत्तर प्रदेश को जातीय उन्माद नहीं, निष्पक्ष और संवेदनशील शासन चाहिए।
यह प्रदेश आग में नहीं, विकास में विश्वास रखता है। और अब जनता तय करेगी कि कौन शांति का प्रहरी है, और कौन सत्ता की भूख में दंगों की राजनीति कर रहा है।
और सबसे अहम — इटावा और प्रयागराज की इन दोनों घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो।
यदि कोई बड़ा नेता, विधायक या सांसद भी दोषी हो — तो उसे भी सलाखों के पीछे भेजा जाए। कानून सबके लिए बराबर हो —यही लोकतंत्र की बुनियाद है।



