यूपीएल की नेक पहल, जल संरक्षण के लिए मॉडल
विलेज ‘बिदल’ को दिया 50 मीट्रिक टन ‘जेबा’
पुणे: वैश्विक स्तर पर कृषि में टिकाऊ उत्पादों और समाधानों को उपलब्ध करवाने वाली कंपनी यूपीएल लिमिटेड ने बिदल गांव के किसानों को मिट्टी में डालने के लिए 50 मीट्रिक टन ‘जेबा’ दिया है। यह ग्रामीणों द्वारा कृषि में क्रांतिकारी परिवर्तन को बढ़ावा देने का एक प्रयास है। कंपनी ने 10 पड़ोसी गांवों में भी इस अभियान को शुरू करने के लिए यह उत्पाद प्रदान किया है। जेबा का उपयोग सुनिश्चित करेगा कि पेड़ों को दिए गए पानी का पूरा उपयोग हो और लगाए गए पेड़ों की मृत्यु टालने के लिए उन्हें बार-बार पानी देने की जरूरत भी घटे।
बिदल महाराष्ट्र में सतारा जिले की मान तहसील में स्थित 6500 की आबादी वाला मध्यम आकार का गांव है। इस गांव में पिछले 55 वर्षों से कोई चुनाव नहीं होने का रिकॉर्ड है, क्योंकि यहां के निवासी ग्राम पंचायतों या सोसायटियों में खुद ही अपने नेतृत्व का चयन करते हैं, अधिकांश उम्मीदवार निर्विरोध चुने जाते हैं। गांव को नई प्रौद्योगिकी अपनाने और नए युग की शिक्षा में अगुवा के रूप में भी जाना जाता है। स्थानीय स्कूल की 42 कक्षाओं में से प्रत्येक ऑडियो-विजुअल लर्निंग के लिए एलईडी टीवी से लैस है। साथ ही यह सतारा जिले की एकमात्र ग्राम पंचायत है जो सभी खरीद ऑनलाइन निविदाओं के माध्यम से करती है।
इसके अलावा, बिदल पश्चिमी महाराष्ट्र के उन गांवों का भी प्रतिनिधित्व करता है, जो वर्षा-छाया या रेन-शेडो क्षेत्र में आते हैं। इसके चलते पीने और अन्य दैनिक जरूरतों के लिए पानी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता। हाल के वर्षों में, यह देखा गया है कि नवंबर के बाद कृषि के लिए पानी मिलना लगभग असंभव है। 1972 के सूखे से पहले, यह गांव कपास के बीज उगाने के लिए प्रसिद्ध था और इसके पास ग्रीष्मकालीन कपास की वरलक्ष्मी बीज किस्म का पेटेंट था। इस क्षेत्र में अंगूर और कई अन्य फसलों की खेती भी हुई, लेकिन 1972 के सूखे के बाद बिदल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि से अन्य व्यवसायों जैसे शिक्षा, सैन्य, इंजीनियरिंग, एमपीएससी और यूपीएससी के माध्यम से सरकारी सेवाओं में स्थानांतरित हो गया। इस तरह कपास के बीज के अच्छे उत्पादक वाली गांव की पारंपरिक पहचान तेजी से घटने लगी।
वर्ष 2017 बिदल में एक बदलाव लेकर आया और स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर बुजुर्गों ने इकट्ठा होकर यथास्थिति को चुनौती देने और 1972 से खोई अपनी जड़ों की ओर वापस जाने का फैसला किया। गांव के लगभग हर ग्रामीण ने अपनी कृषि विरासत को बहाल करने के लिए पानी फाउंडेशन द्वारा शुरू किए गए प्रयास में अपना समय, पैसा और ऊर्जा का योगदान दिया और जल संरक्षण की दिशा में काम किया।
ढाई महीने तक 2000 से अधिक ग्रामीणों ने सुबह से शाम तक पेड़ लगाने का काम किया। पास की पहाड़ियों, सड़कों के किनारे और जहां भी जगह मिली, वहां पेड़ लगाए गए। गांव में रहने वाले 1648 परिवारों के घर फलों की पांच किस्मों वालों पेड़ों से घिर गया। पेड़ों को सीसीटी, लूज बोल्डर, डीप सीसीटी, काउंटर बंडिंग, मिट्टी और जल संरक्षण के लिए गैबिन बंधारे, जलाशयों के निर्माण और कई अन्य संरचनाओं के साथ लगाया गया था।
आज की तारीख में बिदल जल संरक्षण में अग्रणी गांव है और आसपास के क्षेत्रों में 2 लाख पेड़ लगे हुए हैं। किसान प्रमुख नकदी फसल वाली सब्जियां जैसे प्याज और गन्ना उगा रहे हैं, साथ ही 75 एकड़ में अनार, 60 एकड़ में आम और 25 एकड़ में अंगूर लगे हुए हैं।
हालांकि, हर साल ग्रामीणों को एक चुनौती का सामना करना पड़ता है। गर्मी के मौसम के दौरान, खासकर फरवरी से जून तक पुराने पेड़ों और नए लगाए गए पेड़ों को बनाए रखने के लिए पानी की चुनौती का सामना। इन 2 लाख पेड़ों को नियमित अंतराल पर पानी उपलब्ध की चुनौती एक बड़ी चुनौती बन जाती है।


