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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने वाला विधेयक तुरंत रद्द किया जाए

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने वाला विधेयक तुरंत रद्द किया जाए

बसपा का राज्यपाल को पत्र; डॉ. हुलगेश चलवादी ने आंदोलन की चेतावनी दी

 

पुणे: भारत के संविधान में वर्णित न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता जैसे मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों को ठेस पहुँचाने वाला महाराष्ट्र विशेष जनसुरक्षा विधेयक रद्द किया जाए, इस आशय की मांग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने राज्यपाल से की है। इस विधेयक में शामिल कई प्रावधान संविधान और लोकतंत्र की मूल भावना के प्रतिकूल हैं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रत्यक्ष आघात करते हैं। यह बात बसपा के प्रदेश महासचिव तथा पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन के मुख्य प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवादी ने पत्रकारों से बातचीत में स्पष्ट की। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह विधेयक रद्द नहीं हुआ तो बसपा जनआंदोलन छेड़ेगी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राज्य के मुख्य सचिव को भी इस संबंध में पत्र भेजा गया है।

डॉ. चलवादी ने कहा कि इस विधेयक में “कड़वापंथी वाम विचारधारा की संस्थाएं या समान प्रवृत्ति की संस्थाएं” जैसी परिभाषाएं दी गई हैं, जो अस्पष्ट और मनमानी व्याख्या के लिए खुला दरवाज़ा छोड़ती हैं। इस अस्पष्टता के चलते सामाजिक आंदोलनों, अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों, विचारशील लेखकों और नागरिकों को मनमाने ढंग से टारगेट किया जा सकता है।

शांतिपूर्ण विरोध भी हो सकता है अपराध घोषित

विधेयक में “गैरकानूनी कृत्य” की परिभाषा इतनी व्यापक रखी गई है कि उसके अंतर्गत शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करने वाले नागरिकों को भी अपराधी ठहराया जा सकता है। सार्वजनिक व्यवस्था में हस्तक्षेप, लोकसेवकों पर टीका-टिप्पणी, और सरकार विरोधी प्रदर्शन भी इस श्रेणी में शामिल किए जा सकते हैं। इस प्रकार यह विधेयक नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार करता है।

सलाहकार मंडल के नाम पर सत्ता का नियंत्रण

विधेयक में यह प्रावधान है कि किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने से पहले सलाहकार मंडल की रिपोर्ट आवश्यक होगी, लेकिन इस मंडल की नियुक्ति का संपूर्ण अधिकार राज्य सरकार के पास है। इसका अर्थ यह है कि सरकार अपनी सुविधा अनुसार सदस्यों की नियुक्ति कर सकती है और निष्पक्षता का कोई भरोसा नहीं रह जाता। यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक दखल और बदले की भावना से प्रेरित हो सकती है।

न्याय प्रक्रिया को बाईपास करने की कोशिश

विधेयक में जमानत न देने की व्यवस्था, और बिना न्यायालयीय प्रक्रिया के किसी संगठन के अस्तित्व को समाप्त करने की शक्तियाँ सरकार को दी गई हैं। यह पूरी व्यवस्था भारत की न्याय प्रणाली के लिए गंभीर खतरा है। यह ‘कानून के शासन’ की जगह ‘सरकार की धारणा’ को प्राथमिकता देने का प्रयास है। इससे संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार खतरे में पड़ते हैं।

संविधान की मूल धाराओं का उल्लंघन

डॉ. चलवादी ने कहा कि यह विधेयक भारतीय संविधान की धारा 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, 19(1)(b) – शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार, और 19(1)(c) – संघ बनाने का अधिकार का सीधा उल्लंघन करता है। ये अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की बुनियाद होते हैं, और इस विधेयक के माध्यम से उन्हें कुचलने का प्रयास हो रहा है।

राज्यपाल से की गई मांग

बहुजन समाज पार्टी ने राज्यपाल से आग्रह किया है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए इस विधेयक को मंजूरी न दें, अथवा इसे पूरी तरह खारिज करें। डॉ. चलवादी ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने विधेयक वापस नहीं लिया, तो बसपा जनजागरण आंदोलन, रैली, जनसंपर्क और आवश्यक्तानुसार तीव्र विरोध प्रदर्शन शुरू करेगी।

 

बसपा का यह कदम राज्यभर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक आंदोलनों की रक्षा हेतु जनआंदोलन की भूमिका निभाने का संदेश देता है।

 

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