पूणे

रोबोटिक शस्त्रक्रिया के द्वारा छाती के ऊपरी हिस्से में हुआ दुर्लभ ट्यूमर निकालने में नोबल हॉस्पिटल के डॉक्टर को सफलता

रोबोटिक शस्त्रक्रिया के द्वारा छाती के ऊपरी हिस्से में हुआ दुर्लभ ट्यूमर निकालने में नोबल हॉस्पिटल के डॉक्टर को सफलता

 

पुणे: नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर के डॉक्टर की टीम ने रोबोटिक थोरॅसिक शस्त्रक्रिया के द्वारा २८ साल के पुरुष मरीज के छाती के ऊपरी हिस्से में हुआ दुर्लभ ट्यूमर निकालने में सफलता हासिल कि. एक दुकान मे काम करने वाले इस युवक को मायस्थेनिया ग्रॅव्हिस यह बीमारी कुछ महीनों से थी. मायस्थेनिया ग्रॅव्हिस एक गंभीर और चेतातंतू एवं मांसपेशियों से संबंधित (न्युरोमस्क्युलर) स्व-प्रतिरोधक बीमारी है. इस से मांसपेशियों में कमजोरी निर्माण होती हैऔर थकान महसूस होती है.

 

दुसरी तरफ थायमोमा यह ट्यूमर थायमस ग्रंथि में विकसित हो सकता है और इससे एंटीबॉडी तैयार हो सकता है. इन दोनों स्थितियों में हर बार संबंध होगा ऐसे नहीं लेकिन कई बार संबंध हो भी सकता है. यह मरीज मायस्थेनिया ग्रॅव्हिस इस बीमारी के लिए नोबल हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. श्रीपाद पुजारी के पास उपचार ले रहा था. उसकी मांसपेशिया ज्यादा कमजोर हो रही थी और कमजोरी बढ़ रही थी. इस लिए डॉक्टर पुजारी की सलाह से निदान के लिए कुछ टेस्ट किये गए. इस में सीटी स्कैन, पेट स्कैन और एंटीबॉडी के लिए कुछ टेस्ट का समावेश था. इस से थायमोमा इस थायमस ग्रंथि में विकसित दुर्लभ ट्यूमर का निदान हुआ. थायमस ग्रंथि छाती की दीवार और हृदय के बीच के हिस्से में स्थित एक छोटा अवयव है.

 

इस विषय पर बात करते हुए नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर के आँकोसर्जन डॉ. आशिष पोखरकर ने कहा की, इस मरीज को बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी और सांस लेने में तकलीफ हो रही थी इसलिए नॉन- इनवेसिव व्हेंटिलेटर की सहायता ली गयी. ट्यूमर का निदान होने के बाद थायमस ग्रंथि और ट्यूमर निकालने के लिए रॅडिकल थायमेक्टोमी यह प्रक्रिया करने का निर्णय लिया गया. यह ग्रंथि हृदय के सभी महत्वपूर्ण ब्लड वेसल्स के पास होने से कारण यह शस्त्रक्रिया अधिक जोखिम भरी और चुनौतीपूर्ण थी. ऐसे समय पर खुली शस्त्रक्रिया अधिक जोखिम भरा हो सकती है इसलिए हमने रोबोटिक शस्त्रक्रिया करने का निर्णय लिया.

 

उन्होंने आगे कहा की, इस प्रक्रिया से हमने तीन छोटे छेद किये. तीन रोबोटिक आर्म्स के माध्यम से ट्युब और कैमरा अंदर ले लिया गया. रोबोटिक शस्त्रक्रिया में अंदर की प्रतिमा लक्षणीयरूप से बड़ी दिखती है. इस से शस्त्रक्रिया का हिस्सा और आसपास के नसों की स्पष्ट थ्रीडी प्रतिमा दिखती है. रोबोटिक प्रणाली को ३६० अंश के भ्रमण से अधिक सटीकता हासिल की जा सकती है. रोबोटिक प्रणाली से कम से कम रक्तस्त्राव और जटिलता होती है और इससे मरीज जल्दी ठीक होता है, साथ में रुग्णालय का वास्तव कम होगा. लेकिन ट्यूमर की स्थिति ध्यान में लेते हुए इस प्रक्रिया में जोखिम थी. आसपास के नसों को धक्का लगने पर पेट के डायफ्रॅम पर परिणाम हो सकता था. इस लिए रोबोटिक शस्त्रक्रिया जरूरी थी.

 

६ सेमी लंबाई का यह ट्यूमर निकालने के लिए लगभग चार घंटे लगे. उसके बाद हमने यह ट्यूमर बायोप्सी के लिए भेजी है, जिस से यह कर्करोगग्रस्त है या नहीं यह समझेगा. कर्करोगग्रस्त होने पर रेडिओथेरपी और केमोथेरपी जैसे आगे के उपचार की सलाह दी जा सकती है. मरीज की तबियत ठीक है और प्रगति के पथ पर है.

 

इस प्रकार की स्थिति संभालने के लिए सांघिक कार्य आवश्यक होता है. नोबल हॉस्पिटल के टीम में आँकोसर्जन डॉ. आशिष पोखरकर, डॉ. उमेश पापुरनिया, डॉ. भूषण, वरिष्ठ न्युरोलॉजिस्ट डॉ. श्रीपाद पुजारी और वरिष्ठ भूलतज्ञ डॉ. गीतांजली आखाडे-दांगट, डॉ. श्रुती वालावलकर, डॉ. संगीता चंद्रशेखर और भूल शास्त्र विभाग प्रमुख डॉ. एच.के.साळे का समावेश था. एसएसआय मंत्रा 3.0 रोबोटिक सर्जिकल सिस्टिम के इस्तेमाल से नोबल हॉस्पिटल में की गयी यह पहली लेफ्ट थोरॅसिक मीडियास्टिनल ट्यूमर एक्सिशन प्रक्रिया है.

 

ऐसे जटिल प्रक्रिया में मरीज के श्वसन मार्ग का, व्हेंटिलेशन का और सम्पूर्ण शारीरिक स्थिति का व्यवस्थापन करना अत्यंत जरुरी होता है और इसमें भूलतज्ञ की भूमिका जरुरी होती है. ऐसी प्रक्रिया में एक फेफड़े को ओक्सिजन दिया जाता है, और दूसरे का रोक दिया जाता है, जिस से सर्जनों को शस्त्रक्रिया करना आसान होता है. नोबल हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ भूलतज्ञ डॉ. गीतांजली आखाडे-दांगट ने कहा की, मरीज के मांसपेशियों की कमजोरी और न्युरोमस्क्युलर ब्लॉकिंग एजंटस के बढ़ते संवेदनशीलता से मांसपेशियों की शिथिलता का योग्य स्तर रखने के लिए भूल नियंत्रित और अचूक मात्रा में देना जरुरी होता है. इस प्रक्रिया में चुनौतीपूर्ण बात यह थी की ट्युमर फेफड़ो के बहुत पास था, प्रमुख रक्त वाहिकाओं में रक्तचाप और हृदय की गती लगादार बदल रही थी. यह सभी का व्यवस्थापन योग्य रखा गया. शस्त्रक्रिया के आखिर में सोनोग्राफी – मार्गदर्शित रीड की हड्डी के पास ॲनेस्थेशिया दिया गया, जो शस्त्रक्रिया के बाद दर्द कम करने के लिए जरूरी है. शस्त्रक्रिया होने के बाद श्वासपटल का चलन देख कर जल्द ही श्वसन मार्ग में डाली गई नली निकालने में सफलता मिली (एक्सट्युबेट). ऐसे मरीजों को शस्त्रक्रिया के बाद दीर्घकाल व्हेंटिलेटर के आधार की बहुत शक्यता होती है.

 

नोबल हॉस्पिटल्स ॲन्ड रिसर्च सेंटर के संचालक डॉ. दिविज माने ने कहा की, नोबल हॉस्पिटल ने डिसेंबर २०२४ में महाराष्ट्र की पहली एसएसआय मंत्रा 3.0 रोबोटिक सर्जिकल सिस्टिम प्रस्थापित की गयी थी. यह एक अद्ययावत और अभिनव प्रणाली है जिस से शस्त्रक्रिया में अधिक कार्यक्षमता और सटीकता हासिल होती है और मरीज को अच्छे परिणाम मिलते है. यह प्रणाली कार्यान्वित करने के बाद कुछ ही महीनों में हम ३० से ज्यादा रोबोटिक शस्त्रक्रिया सफलता से कर चुके है. नए तंत्रज्ञान का ग्रहण करते हुए मरीजों के लिए प्रक्रिया में अधिक सटीकता और प्रभावशीलता हासिल करने में हम प्रतिबद्ध है.

 

 

 

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