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क्या शैक्षणिक संस्थाएँ भी फँस गई हैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जाल में? — संस्थानों की साख पर उठे कई सवाल

क्या शैक्षणिक संस्थाएँ भी फँस गई हैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जाल में? संस्थानों की साख पर उठे कई सवाल

(लेखक: डॉ. तुषार निकालजे)

 

पुणे: आज पूरी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। तकनीकी विकास के साथ AI का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है, परंतु कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में यह मानव-बुद्धि के लिए एक प्रकार का खतरा भी बन सकता है। कई व्यक्ति, संगठन, कार्यालय और राजनेता AI का इस्तेमाल अपनी छवि और पद को ऊँचा दिखाने के लिए कर रहे हैं।

 

AI एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ाया जाने वाला विषय है, लेकिन अब यह देखा जा रहा है कि खुद शैक्षणिक संस्थाएँ ही इसके प्रभाव में बहक रही हैं।

 

हाल ही में एक शैक्षणिक संस्था ने दावा किया कि वह वैश्विक स्तर पर शीर्ष रैंकिंग में शामिल हो गई है और राज्य, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पटल पर ‘सर्वश्रेष्ठ’ होने का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया है। आजकल हर संस्था अपनी वेबसाइट पर ग्रेडिंग, रेटिंग, मान्यता आदि प्रकाशित करती है, लेकिन जो संस्थाएँ ये रैंकिंग जारी करती हैं, उनके मानदंड आम लोगों के लिए अस्पष्ट होते हैं।

 

इसी संस्था ने कुछ दिन पहले ही एक निजी सर्वेक्षण का हवाला देते हुए खुद को राज्य स्तर पर टॉप-5 में बताया था। परंतु हकीकत यह है कि बीते तीन वर्षों में इस संस्था का राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) से कोई मूल्यांकन नहीं हुआ है। इसके अलावा, लगभग 90 से 110 फैकल्टी पद खाली हैं। ऐसे में रैंकिंग का दावा कितना सही है, यह विचारणीय है।

 

कुछ संस्थाएँ अपने किसी विभाग को ‘अत्याधुनिक स्मार्ट विभाग’ बताकर प्रचार कर रही हैं, लेकिन जांच करने पर पता चलता है कि उस विभाग के प्रमुख को उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीशों की समिति ने अयोग्य घोषित किया है। फिर भी, संस्था की गवर्निंग बॉडी और यहाँ तक कि शासन से भी उन्हें माफ कर दिया जाता है।

 

यह स्थिति जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर के विचारों की याद दिलाती है— “जहाँ मंत्री होते हैं, वहाँ राजनीति प्रवेश कर जाती है।”

यदि किसी मंत्री के रिश्तेदार गवर्निंग बॉडी में हों, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।

 

दुखद यह है कि ऐसी संस्थाएँ छात्रों के दाख़िले के समय नियमों का सख्ती से पालन करती हैं। 0.01% या 1 अंक से वंचित छात्र-छात्राएँ निराश हो जाते हैं, और कुछ पालक कर्ज़ लेकर, ज़मीन या घर गिरवी रखकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं।

 

जून-जुलाई के दौरान संस्थाएँ इसी तरह की मार्केटिंग और विज्ञापन शुरू करती हैं। कुछ संस्थाएँ तो अपने खिलाफ हुए विवादों को भी “Best Actor in Negative Role” की तरह दिखाने में संकोच नहीं करतीं।

 

एक अन्य संस्था को हालिया रैंकिंग में टॉप-5 में रखा गया था, लेकिन उस कॉलेज की छात्र संख्या में पिछले तीन वर्षों में 15–20% की गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में उसकी शीर्ष रैंकिंग पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।

 

यह भी देखा गया है कि कुछ संस्थाएँ “Best of Performance” जैसे छात्रों के लिए बनाए गए नियम का दुरुपयोग करते हुए पिछले वर्षों की खराब स्थिति को छिपाकर अपनी रैंकिंग को बेहतर दर्शाती हैं। इस नियम के अनुसार, यदि कोई छात्र किसी विषय में लगातार तीन वर्ष फेल हो और अंतिम वर्ष में सभी विषयों में पास हो जाए, तो उसे पुराने वर्षों में अधिकतम अंक देकर पास किया जाता है। यही पैटर्न संस्थाएँ खुद के लिए लागू करती दिख रही हैं।

अब सवाल यह उठता है कि क्या शैक्षणिक संस्थाएँ भी अपने मान-सम्मान, व्यापार और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए कृत्रिम रेटिंग्स और AI आधारित छवि निर्माण का सहारा ले रही हैं?

 

विद्यापीठ अनुदान आयोग (UGC) द्वारा दी गई स्वायत्तता का दुरुपयोग किया जा रहा है। फ़ीस में मनमानी बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह सवाल प्रासंगिक हो गया है कि — क्या शिक्षा अब समाज-निर्माण का माध्यम न होकर एक व्यापार बन गया है?

कुछ समय पहले एक राज्य के विश्वविद्यालय में A++ रेटिंग के लिए 1.80 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का मामला भी उजागर हुआ है।

(लेखक विश्वविद्यालय प्रशासन, विधिक ढांचा एवं चुनाव प्रक्रिया के विशेषज्ञ हैं)

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