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युवा अवस्था में ही सहव्याधी होने से किडनी कैंसर का खतरा बढ़ सकता है- विशेषज्ञ

युवा अवस्था में ही सहव्याधी होने से किडनी कैंसर का खतरा बढ़ सकता है- विशेषज्ञ

 

पुणे: युवा अवस्था में ही सहव्याधी होने से जीवन के आगे के पड़ाव में किडनी कैंसर का धोका बढ़ रहा है ,लेकिन जीवनशैली में बदलाव लाने से यह जोखीम काफी हद तक कम हो सकती है ऐसी राय विशेषज्ञों ने दी है.

 

जून महीने के तीसरे गुरुवार को जागतिक किडनी कैंसर दिन के अवसर पर इस बीमारी के बारे में जागरूकता की जाती है. सभी कैंसर में से सबसे ज्यादा पाया जाने वाला यह १४ वा सामान्य कैंसर है. इसका प्रमाण सभी कैंसर में २ से ३ प्रतिशत है. पश्चिमी देशों के तुलना में भारत में युवा अवस्था में यह कैंसर ज्यादा पाया जाता है जिसका निदान सामान्यतः ५० की उम्र के होने वाला यह कैंसर है. बहुत बार इस कैंसर का अगले पड़ाव में निदान होता है जो महिलाओ के तुलना में पुरुषों में ज्यादा पाया जाता है.

 

विश्वराज हॉस्पिटल, लोणी के वरिष्ठ मुत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. संजय धनगर ने कहा की, युवा अवस्था में ही मोटापा, उच्च रक्तदाब और मधुमेह होने के कारण कैंसर होने की जोखीम भी दीर्घकाल रहती है और किडनी कैंसर का खतरा बढ़ता है. युवा अवस्था में यह कैंसर होने से वह ज्यादा आक्रमक होता है. किडनी के कैंसर में जोखिम भरे कारको में धुम्रपान, मोटापा ,उच्च रक्तदाब और इन बीमारियों का परिवार में वैद्यकीय इतिहास इन सभी का समावेश है. इसके अलावा दीर्घकालीन किडनी की बीमारी और व्होन हिप्पेल-लिंडाऊ की बीमारी या बर्ट हॉग ड्यूब सिंड्रोम जैसी अनुवंशिक बीमारी और ॲस्बेसटॉस, कॅडमियम, ट्रायक्लोरोइथेलिन (टीसीई) जैसे रसायनो से संपर्क यह सभी चीजों से जोखीम बढ़ सकती है.

 

लेकिन जीवनशैली में बदलाव करने से यह जोखीम काफी कम हो सकती है, ऐसा डॉ. धनगर ने कहा. वजन नियंत्रित रखना, शरीर में द्रव और पानी का प्रमाण रखना, सकस और संतुलित आहार, धुम्रपान छोड़ना, रक्तदाब नियंत्रण में रखना और शारीरिक व्यायाम करना इससे कैंसर का खतरा कम हो सकता है, और जिनमे इसका निदान हो चूका है उनका जीवन का प्रमाण बढ़ सकता है. डॉक्टर की सलाह के सिवाय वेदनाशामक दवाइयां न ले, क्यूकी इसका किडनी के कार्य पर परिणाम होता है. जरूरी बात यह है की नियमित स्वास्थ्य की जांच यह प्रभावी उपचार और अच्छे परिणाम के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है.

 

जिन लोगों को पेशाब में खून (हिमॅट्युरिया), पीठ में या एक बाजू में चोट न होते हुए भी दर्द हो रहा हो, बिना वजह वजन कम होना, थकान महसूस होना, पेट या बगल में गांठ महसूस होना या बिना वजह बुखार आना या रात में पसीना आना यह समस्या हो तो डॉक्टर से मिल कर सलाह ले.

 

किडनी कैंसर में आनुवंशिकता यह भी एक जरूरी बात है और सभी किडनी कैंसर में से इसका प्रमाण ५ से ८ प्रतिशत है. बहुत बार ऐसे प्रकार का कर्करोग अनुवंशिक बदलाव से संबंधित नहीं हो तो भी उच्च जोखिम होने वाले लोग पहचान ने के लिए और संभावित रूप से लक्षित उपचार के लिए आनुवंशिक कारक समज कर लेना जरूरी है.

 

डॉ. धनगर ने कहा की, उपचार के प्रगती में मरीजों को दिलासा मिल रहा है और आशा निर्माण हो रही है. इसमें रोबोटिक शस्त्रक्रिया, लक्ष्यित उपचार पद्धति (टार्गेटेड थेरपीज) एवं इम्युनो थेरपी और क्रियोॲब्लेशन, रेडिओ फ्रिक्वेन्सी ॲब्लेशन जैसे कम से कम छेद होनेवाले प्रक्रियाओ का समावेश है.

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