
शैक्षणिक संस्थानों को मूल्यों और सद्विचारों के विश्वविद्यालय बनाए
परम पूज्य स्वरूपानंद सरस्वती स्वामीजी के विचार :
डॉ. विश्वनाथ दा कराड को ‘शिवशहिर बाबासाहेब पुरंदरे’ पुरस्कार से सम्मानित
पुणे: देश के सभी विश्वविद्यालयों को अत्याधुनिक शिक्षा प्रदान करनी चाहिए, लेकिन मूल्य और सद्विचार ही जीवन को आकार देते हैं. इसलिए शैक्षणिक संस्थानों को सद्विचारों के विश्वविद्यालय बनाना चाहिए. मूल्य ही जीवन को आकार देते है, वहीं विचार तर्क शुद्ध होने से हम एक सुंदर नई पीढ़ी का निर्माण कर सकते है. यह विचार श्रुतिसागर आश्रम, फुलगाँव के संस्थापक परमपूज्य स्वरूपानंद सरस्वती स्वामी ने व्यक्त किए.
महाराष्ट्र कीर्ति सौरभ प्रतिष्ठान की ओर से परम पूज्य स्वरूपानंद सरस्वती स्वामी ने एमआईटी विश्वशांति विश्वविद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष प्रो.डॉ. विश्वनाथ दा. कराड को शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे पुरस्कार २०२५ से सम्मानित किया गया. उन्हें एक लाख रुपये का चेक, स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र, पगडी और माला प्रदान की गई. साथ ही इतिहासकार डॉ. केदार फालके को श्रीमंत मोरेश्वर बलवंत पुरंदरे छात्रवृत्ती २०२५ से सम्मानित किया गया. उन्हें प्रशस्ति पत्र, ५० हजार रुपये का चेक, पगडी और माला दी गई.
इस अवसर पर भारत इतिहास शोध मंडल के अध्यक्ष प्रदीप रावत, अमृत पुरंदरे आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुणे के संचालक रवींद्र वंजारवाडकर ने की. इस समय जाणता राजा के कलाकार सुनील थोपटे का विशेष सम्मान किया गया.
स्वरूपानंद सरस्वती स्वामी ने कहा, बाबासाहेब के नाम पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार ऐसे महान और शिक्षा महर्षि को दिया गया है. सही व्यक्ति को सही पुरस्कार देना भी एक संयोग है. मन ही व्यक्ति को शून्य से उच्चतर स्तर पर ले जाता है और यही उसे उच्चतर स्तर से धरातल पर भी लाता है. ऐसे समय में समय के अनुसार मन में मूल्यों का संचार करने वाली शिक्षा प्रणाली आवश्यक है.

पुरस्कार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रो.डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने कहा, मैने जीवन भर विनम्रता से काम करने का प्रयास किया. इसलिए मुझे आंतरिक शांति का अनुभव हो रहा है. गुणों की आराधना ही ईश्वर की आराधना है. बाबासाहेब सौ वर्ष की आयु में पदार्पण कर रहे थे. तभी मेरी उनसे मुलाकात हुई. बाबासाहेब हमेशा विनम्रता से बात करते थे. बाबासाहेब ने शिवाजी के जीवन के सच्चे दर्शन के साथ एक अलग दृष्टिकोण से राज्य और देश का निर्माण किया.
डॉ. केदार ने कहा, बाबासाहेब पुरंदरे हमेशा कहते थे कि अगर डर लगता है, तो इतिहास मत पढो. एक इतिहासकार को सच बोलना चाहिए, उसे कभी पीछे नहीं हटना चाहिए और किसी का अपमान नहीं करना चाहिए. उसे निरंतर सत्य की खोज करनी चाहिए और समस्याओं की जड़ तक पहुंचना चाहिए.
रवींद्र वंजारवाडकर ने कहा, बाबासाहेब के नाम पर डॉ. विश्वनाथ दा कराड को दिया गया पुरस्कार एक ध्यासपर्व द्वारा दूसरे को दिया जाने वाला सम्मान है. बाबासाहेब ने इतिहास को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया, उन्होंने कभी सत्य को विकृत नहीं किया.
तत्पश्चात प्रदीप रावत और अमृत पुरंदरे ने बाबासाहेब पुरंदरे को याद किया.
सूत्रसंचालन मिलिंद कुलकर्णी और राधा पुरंदरे आगासे से आभार माना.


