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शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग प्रक्रिया में बदलाव करने की आवश्यकता

शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग प्रक्रिया में बदलाव करने की आवश्यकता डॉ. तुषार निकाळजे

पुणे |विशाल समाचार 

प्रत्येक वर्ष जून-जुलाई माह आते ही विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग से जुड़ी जानकारी समाचारों, वेबसाइटों तथा चर्चाओं के माध्यम से सामने आती है। कई संस्थाएँ यह दर्शाने का प्रयास करती हैं कि वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं, जिससे आमजन आकर्षित भी होते हैं। परंतु इन रैंकिंग्स के मापदंडों में बीते आठ-दस वर्षों से कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। यह आवश्यक है कि जैसे पाठ्यक्रम हर पाँच वर्ष में तथा शैक्षणिक नीतियाँ हर दस वर्ष में बदली जाती हैं, वैसे ही रैंकिंग के मापदंडों की भी समयानुकूल समीक्षा की जाए

रैंकिंग की प्रक्रिया में केवल संस्थाओं की वेबसाइट पर प्रदर्शित आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालना एकतरफा है। जैसे हम विवाह तय करने से पहले व्यक्ति और उसके परिवार की सामाजिक पड़ताल करते हैं, वैसे ही शैक्षणिक संस्थाओं की वास्तविक स्थिति जानने हेतु वहाँ अध्ययनरत छात्रों, शिक्षकों, शिक्षकेतर कर्मचारियों, पत्रकारों और स्थानीय नागरिकों से संवाद आवश्यक है। इसके साथ ही, संस्था जिस क्षेत्र में स्थित है, वहाँ की स्थानीय पुलिस चौकी से भी पृष्ठभूमि की पुष्टि की जानी चाहिए।

कई बार विश्वविद्यालयों की वेबसाइट पर ऐसे प्राध्यापकों की शोध-सूचनाएँ भी प्रदर्शित होती हैं जो पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके होते हैं, जिससे आँकड़ों का कृत्रिम विस्तार कर रैंकिंग को प्रभावित किया जाता है। कुलगुरु निवास की साज-सज्जा पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, परंतु शोध के लिए किसी विद्वान को मामूली अनुदान भी नहीं मिल पाता। यह विडंबना दर्शाता है कि संसाधनों का उपयोग प्राथमिकताओं के विरुद्ध हो रहा है।

रिसर्च पार्क के नाम पर भवन निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, परंतु शोधार्थियों के लिए बनी प्रयोगशालाएँ महीनों तक बंद पड़ी रहती हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (RUSA) और राष्ट्रीय उच्च शिक्षा आयोग (NAAC) द्वारा स्वीकृत अनुसंधान निधि का उचित उपयोग न हो पाना एक गंभीर चिंता का विषय है। शोधार्थियों को कई बार यह जवाब मिलता है कि उनके अध्ययन विषय के लिए विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है, जिससे दो वर्षों का अमूल्य समय व्यर्थ चला जाता है।

उसी विषय के लिये ही संस्थाओं को ही अनुदान प्राप्त हो चुका होता है।

एक अन्य उदाहरण में उन्होंने बताया कि किसी शोध-पत्र के लिए मात्र ₹1500 की प्रोसेसिंग फ़ीस की स्वीकृति नहीं दी जाती, जबकि अन्य खर्चों पर उदारता दिखाई जाती है। इसी तरह, कुछ महीने पूर्व एक राज्य की शैक्षणिक संस्था में NAAC मूल्यांकन के दौरान करोड़ों रुपये के अनियमित खर्च सामने आए, रैंकिंग करने वाले संस्थाओं को केवल प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के आधार पर निर्णय न लेकर, क्षेत्रीय और सामाजिक वास्तविकताओं का सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए। तकनीकी युग में जहाँ ऑनलाइन जानकारी उपलब्ध है, वहीं मीडिया रिपोर्ट्स और संस्थाओं द्वारा दी गई जानकारी का आपसी मिलान (क्रॉस चेक) भी अनिवार्य होना चाहिए। वर्तमान रैंकिंग प्रक्रिया की पद्धति और प्रणाली में बदलाव आवश्यक है, जिससे देश की शैक्षणिक गुणवत्ता का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सके।

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