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सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय की जांच समितियों पर उठते सवाल

सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय की जांच समितियों पर उठते सवाल!

विशाल समाचार संवाददाता 

पुणे :सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय द्वारा एक महाविद्यालय में सामने आए अनियमितताओं के मामले में अपनी प्रबंधन परिषद के एक सदस्य की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई है। नियमानुसार यह कदम अपेक्षित था, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद दोषियों पर विश्वविद्यालय क्या कार्रवाई करता है?

पिछले 20 वर्षों के विश्वविद्यालय के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसे कई मामलों में जांच समितियां गठित की गईं, रिपोर्ट भी दी गई, परंतु अधिकांश मामलों में दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

 

एक मामले में फर्जी महाविद्यालय को मान्यता दिलाने के लिए कुलगुरु कार्यालय के एक अधिकारी का हस्तक्षेप सामने आया। उसकी केवल पदस्थापना बदली गई, परंतु बाद में वेतनवृद्धि, पदोन्नति और सभी शासकीय लाभ दिए गए। वर्ष 2008 में अनियमित नियुक्तियों पर समिति बनी, दोषियों को अस्थायी निलंबन मिला, परंतु बाद में बहाल कर दिए गए।

वर्ष 2013 में परीक्षा विभाग में 03 से 13 ग्रेड वृद्धि से जुड़ा मामला सामने आया, जिसकी जांच रिपोर्ट कुलगुरु को सौंपी गई, लेकिन दोषियों को दंडित करने की बजाय पदोन्नतियां और वेतनवृद्धि दी गईं।

प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पीएच.डी. नियमों के उल्लंघन, परीक्षा नियंत्रकों की पदावनति के बावजूद सेवा विस्तार, और रैप सॉन्ग प्रकरण जैसे गंभीर मामलों में भी कार्रवाई या तो टली या टाल दी गई।

जनवरी 2023 में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय की मुख्य इमारत में एक अनियमित रैप सॉन्ग प्रकरण सामने आया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन कुलगुरु ने महाराष्ट्र राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री जयंत उमराणेकर की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया था।

इस समिति द्वारा कुलगुरु को सौंपे गए रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव सहित कुल दस अधिकारियों और कर्मचारियों की त्रुटियों का उल्लेख किया गया था। यह रिपोर्ट माननीय कुलपति तथा महाराष्ट्र राज्य के राज्यपाल को भेजी गई। राज्यपाल ने इस मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके साथ ही महाराष्ट्र सरकार के उच्च व तंत्र शिक्षा विभाग, मंत्रालय मुंबई ने भी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए।

जांच समिति की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय प्रशासन और सुरक्षा विभाग की कई खामियों की ओर इशारा किया गया था, जिनमें से कुछ त्रुटियाँ इतनी गंभीर थीं कि वे भविष्य में किसी अप्रिय घटना को न्योता दे सकती थीं — यह बात रिपोर्ट में विशेष रूप से दर्ज की गई है।

जांच समितियों पर खर्च किस निधि से होता है?

जांच समितियों के लिए आवश्यक खर्च विश्वविद्यालय किस निधि से करता है? यह प्रश्न अब छात्रों और अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है। दरअसल, छात्रों से विभिन्न मदों में लिए गए शुल्क और शासन, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, समाज कल्याण विभाग, सामाजिक न्याय विभाग, तथा राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा आयोग से शैक्षणिक और शोध कार्यों के लिए प्राप्त अनुदानों से यह निधि एकत्रित होती है।

वर्तमान में भी कई ऐसे मामलों की जांच समितियों की रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन उन पर आगे क्या कार्रवाई होगी — यह अब भी एक अनुत्तरित प्रश्न बना हुआ है।

 

इन मामलों में किसका संरक्षण प्राप्त है? किसके प्रभाव से दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो रही? कौन किसके दबाव में है? किसका हित किससे जुड़ा है? इन सवालों पर किसी ने आज तक कुछ नहीं किया।

जब मेरी बारी आएगी तब देखूंगा” — इस मानसिकता और टालमटोल प्रवृत्ति ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया है। ऐसे में अब एक नई, स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति गठित करना भविष्य की आवश्यकता बनती जा रही है, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

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